चमन की श्री दुर्गा स्तुति

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सर्व कामना पूर्ण करने वाला पाठ चमन की श्री दुर्गा स्तुति
श्री दुर्गा स्तुति – यह पूरे दो महीने की तपस्या तथा भगवत नाम कीर्तन, दुर्गा यज्ञ, गायत्री मन्त्र के निरन्तर जप और दुर्गा मन्दिरों की दिव्य मूर्तियों के दर्शन, महात्माओं के आर्शीवाद तथा साक्षात देव-कन्याओं की कृपा और मां की प्रेरणा से लिखी गई है।
इसके पाठ का कोई भी शब्द घटाया या बढ़ाया न जाये, इसके हर शब्द ‘चमन’ नाम इत्यादि का भाव एक दूसरे पर निर्भर है। कोई भी अक्षर बदलकर पढ़ने से भयानक हानि हो सकती है।। इसका पाठ करने से हर प्रकार की कामना पूर्ण होती है।
शुद्ध वस्त्र, शुद्ध अवस्था, शुद्ध भावना, शुद्ध मन से पाठ करें।
श्री दुर्गा स्तुति के कौन से अध्याय का पाठ किस लिए करें।
निष्काम भाव से रोजाना पढ़ने वाले यह पाठ करें, दुर्गा कवच, मंगला • स्तोत्र, अर्गला स्तोत्र, कीलक स्तोत्र, काली, चण्डी, लक्ष्मी, संतोषी मां रुक्षेत्र नम्र प्रार्थना, नवदुर्गा स्तोत्र तथा आरती।
हर प्रकार की चिन्ता हटाने के लिए प्रथम अध्याय। हर प्रकार के झगड़े जीतने के लिए दूसरा अध्याय। शत्रु से छुटकारा पाने के लिए तीसरा, भक्ति-शक्ति या भगवती से के दर्शन पाने के लिए चौथा व पांचवा अध्याय |
डर वहम प्रेत छाया आदि हटाने के लिए छटा अध्याय हर कामना पूरी करने के लिए सातवां अध्याय । मिलाप वशीकरण के लिए आठवां गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना पुत्रादि प्राप्त करने के लिए नवम् तथा दसवां अध्याय।
व्यापार, सुख सम्पति के लिए ग्यारहवां। भक्ति प्राप्त करने के लिए बाहरवां अध्याय। मान तथा लाभ के लिए तेहरवां अध्याय | सफर जाने से पहले दुर्गा कवच श्रद्धा और शुद्ध भावना से पढे।
धन दौलत कारोबार के लिए चण्डी स्तोत्र कलह कलेश चिन्ता से बचने के लिए महाकाली लक्ष्मी नव दुर्गा स्तोत्र पढ़िए यदि सारा पाठ न कर सके तो दुर्गा अष्टनाम और नव दुर्गा स्तोत्र पढ़ें।
पाठ के समय गंगा जल या कुएं का जल साथ रखें शुद्ध आसन बिछा कर बैठे, घी की जोत या सुगन्धित धूप जलाएं, पाठ के बाद चरणामृत पी लें और अपने मस्तक आंखे और अंगो को स्पर्श करें। मंगलवार को कन्या पूजन करें कन्या सात वर्ष की आयु से कम होनी चाहिए।
श्री दुर्गा स्तुति पाठ विधि
ब्रम्ह मुहूर्त में उठते समय जय जगदम्बे जय जय अम्बे का ग्यारह बार मुंह में जाप करें।
शौच आदि से निवृत हो कर स्नान करने के बाद लाल रुमाल कन्धे पर रखकर पाठ करें।
मौली दाई कलाई पर बांधे या बंधवा लें।
आसन पर चौकड़ी लगा (बैठ कर) हाथ जोड़ कर बोलें :
पौना वाली माता जी तुहाडी सदा ही जय। भगवती मां के सामने घी की जोत जला कर पाठ प्रारम्भ करें
श्री दुर्गा स्तुति प्रारम्भ

यहा से पाठ प्रारम्भ करें …
श्री दुर्गा स्तुति पाठ प्रारम्भ – मिट्टी का तन हुआ पवित्र गंगा के अश्नान से।
अन्तः करण हो जाए पवित्र जगदम्बे के ध्यान से।
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सवार्थ साधके।
शरण्ये त्रियम्बके गौरी नारायणी नमो स्तुते।
शक्ति शक्ति दो मुझे करु तुम्हारा ध्यान।
पाठ निर्विघ्न हो तेरा मेरा हो कल्याण।
हृदय सिंघासन पर आ बैठो मेरी मात।
सुनो विनय मम दीन की जग जननी वरदात।
सुन्दर दीपक घी भरा करुं आज तैयार।
ज्ञान उजाला मां करो मेटो मोह अन्धकार।
चन्द्र सूर्य की रोशनी चमके चमन’ अखण्ड।
सब में व्यापक तेज है ज्वाला का प्रचण्ड।
ज्वाला जग जननी मेरी रक्षा करो हमेश।
दूर करो मा अम्बिके मेरे सभी कलेश।
श्रद्धा और विश्वास से तेरी जोत जलाऊ।
तेरा ही है आसरा तेरे ही. गुण गाऊ।
तेरी अदभूत गाथा को पढ़ू मैं निश्चय धार।
साक्षात दर्शन करूं तेरे जगत आधार।
मन चंचल से पाठ के समय जो औगुण होय।
दाती अपनी दया से ध्यान न देना कोय।
मैं अनजान मलिन मन न जानें कोई रीत।
अट पट वाणी को ही मां समझो मेरी प्रीत।
‘चमन’ के औगुण बहुत है करना नहीं ध्यान।
सिंह वाहिनी मां अम्बिके करो मेरा कल्याण।
धन्य धन्य मा अम्बिके शक्ति शिवा विशाल।
अंग अंग में रम रही दाती दीन दयाल।
प्रसिद्ध भेट माता जी
मैय्या जगदाता दी कह के जय माता दी तुरया जावीं, देखी पैंडे तों न घबरावी।
पहलां दिल अपना साफ बना लै।फेर मैय्या नूं अर्ज सुना लै।
मेरी शक्ति वधा मैनूं चर्णा च ला।कैंहदा जावीं, देखी पैंडे तो न घबरावीं।मैय्या….
ओखी घाटी ते पैंडा अवलड़ा।ओदी श्रद्धा दा फड़ लै तू पलड़ा।
साथी रल जानगे, दुखड़े टल जानगे।भेटा गांवी, देखी पैंडे तों न घबरावीं। मैय्या…..
तेरा हीरा जन्म अनमोला।मिलना मुड़ मुड़ न मानुष दा चोला।
धोखा न खा लवीं दाग न ला लवीं।बचदा जावीं, देखी पैंडे तों न घबरावीं। मैय्या….
पहला दर्शन है कौल कन्दौली।दूजी देवा ने भरनी है झोली।
आद कंवारी नूं जगत महतारी नूं।सिर झुकावीं देखी पैंडे तो न घबरावी।मैय्या….
ओहदे नाम दा लै के सहारा।लंघ जावेंगा पर्वत ऐ सारा।देखी सुन्दर गुफा, चमन जै जै बुला।
दर्शन पावीं, देखी पैंडे तो न घबरावीं। मैय्या….
श्री दुर्गा स्तुति सर्व कामना सिद्धि
भगवती भगवान की भक्ति करो परवान तुम।
अम्बे कर दो अमर जिस पे हो जाओ मेहरबान तुम।
काली काल के पंजे से तुम ही बचाना आन कर।
गौरी गोदी में बिठाना अपना बालक जान कर।
चिन्तपुरनी चिन्ता मेरी दूर तुम करती रहो।।
लक्ष्मी लाखों भण्डारे मेरे तुम भरती रहो।
नैना देवी नैनों की शक्ति को देना तुम बढ़ा।
वैष्णों मां विषय विकारों से भी लेना तुम बचा।
मंगला मंगल सदा करना भवन दरबार में।
चण्डिका चढ़ती रहे मेरी कला संसार में।
भद्रकाली भद्र पुरुषों से मिलाना तुम सदा।
ज्वाला जलना ईर्षा वश यह मिटाना कर कृपा।
चामुण्डा तुम ‘चमन’ पे अपनी दया दृष्टि करो।
माता मान इज्जत व सुख सम्पत्ति से भण्डारे भरो।
श्री दुर्गा स्तुति प्रार्थना (श्री गणेशाय नमः)
‘चमन’ मत समझो लियाकत का यह होता मान है। लाज अपने नाम की वह रख रहा भगवान है।
जय गणेश जय गणपति पार्वती सुकुमार।विघ्न हरण मंगल करण ऋद्धि सिद्धि दातार।
कवियों के मानुष विमल शोभा सुखद ललाम। ‘चमन’ करे तब चरणों में कोटि कोटि प्रणाम।
जय बजरंगी पवन सुत जय जय श्री हनुमान ।आदि शक्ति के पुत्र हो करो मेरा कल्याण।
नव दुर्गा का पाठ यह लिखना चाहे दास।अपनी कृपा से करो पूर्ण मेरी आस।
त्रुटियां मुझ में हैं कई बखशना बखशनहार। मैं बालक नादान हूं तेरे ही आधार।
बल बुद्धि विद्या देहो करो शुद्ध मन भाओ।शक्ति भक्ति पाऊं मैं दया दृष्टि दरसाओ।
आदि शक्ति के चरणों में करता रहू प्रणाम।सफल होए जीवन मेरा जपता रहं श्री राम।
गौरी पुत्र गणेश को सच्चे मन से ध्याऊं। शारदा माता से ‘चमन’ लिखने का वर पाऊं।
नव दुर्गा के आसरे मन में हर्ष समाये। महाकाली जी कर कृपा सभी विकार मिटाये।
चण्डी खड़ग उठाये कर करे शत्रु का नास। काम क्रोध मोह लोभ का रहे न मन में वास।
लक्ष्मी, गौरी, धात्री, भरे मेरे भण्डार।लिखू मैं दुर्गा पाठ को दिल में निश्चय धार।
अम्बा जगदम्बा के जो मन्दिर माही जाए। पढ़े पाठ यह प्रेम से या पढ़ के ही सुनाए।
एक आध अक्षर पढ़े जिसके कानों माहिं।उसकी सब मनोकामना पूरी ही हो जाहिं।
माता उसके सीस पर धरे कृपा का हाथ। ऐसे अपने भक्त के रहे सदा ही साथ।
संस्कृत के श्लोकों की महिमा अति अपार।टीका कैसे कर सके उसका ‘चमन’ गंवार।
मां के चरणों में धरा सीस जभी घबराए। जग जननी की कृपा से भाव गये कुछ आए।
उन भावों के आसरे टूटे फूटे बैन।गरुदेव की दया से लिख कर पाऊ चैन।
भाषा दुर्गा पाठ की सहज समझ आ जाए। पढ़कर इसको जीव यह मन वांछित फल पाए।
महामाया के आसरे किये जाओ गुणगान।पूरी सब आशा तेरी करेंगे श्री भगवान।
निश्चय करके पाठ को करेगा जो प्राणी। वह ही पायेगा ‘चमन’ आशा मन मानी।
श्री दुर्गा कवच….
ऋषि मारकंडे ने पूछा जभी।
दया करके ब्रह्मा जी कवच दुर्गा बोले तभी।
कि जो गुप्त मन्त्र है संसार में।
हैं सब शक्तियां जिसके अधिकार में।
हर इक का जो कर सकता उपकार है।
जिसे जपने से बड़ा ही पार है।
पवित्र कवच दुर्गा बलशाली का।
जो हर काम पूरा करे सवाली का।
सुनो मारकंडे मैं समझाता हूं।नव दुर्गा के नाम बतलाता हूं।
कवच की मैं सुन्दर चौपाई बना।जो अत्यन्त है गुप्त देऊं बता।
नव दुर्गा का कवच यह पढ़े जो मन चित लाये।
उस पे किसी प्रकार का कभी कष्ट न आये।
कहो जय जय महारानी की, जय दुर्गा अष्ट भवानी की।
पहली शैलपुत्री कहलावे, दूसरी ब्रह्मचारणी मन भावे।
तीसरी चन्द्रघटा शुभनाम, चौथी कूशमांडा सुख धाम।
पांचवी देवी असकन्ध माता, छटी कात्यायनी विख्याता।
सातवीं काल रात्रि महामाया, आठवीं महां गौरी जगजाया।
नौंवी सिद्धि धात्री जग जाने, नव दुर्गा के नाम बखाने ।
महा संकट में वन में रण में, रोग कोई उपजे निज तन में।
महा विपति में व्योहार में, मान चाहे जो राज दरबार में।
शक्ति कवच को सुने सुनाये, मनोकामना सिद्धि नरपाये।
दोहा – चामुण्डा है प्रेत पर वैष्णवी गरुड़ असवार।
बैल चढ़ी महेश्वरी, हाथ लिये हथियार।
हंस सवारी वाराही, की मोर चढ़ी दुर्गा कौमारी।
लक्ष्मी देवी कमल आसीना, ब्रहमी हंस चढ़ी ले वीणा।
ईश्वरी सदा बैल असवारी, भक्तन की करती रखवारी।
शंख चक्र शक्ति त्रिशूला, हल मूसल कर कमल के फूला।
दैत्य नाश करने के कारण, रुप अनेक कीन है धारण।
बार बार चर्णन सिर नाऊं, जगदम्बे के गुण को गाऊं।
कष्ट निवारण बलशाली मां, दुष्ट संघारण महांकाली मां।
कोटि कोटि माता प्रणाम, पूर्ण कीजो मेरे काम।
दया करो बलशालिनी, दास के कष्ट मिटाओ।
चमन की रक्षा को सदा सिंह चढी मां आओ।
कहो जय जय महारानी की, जय दुर्गा अष्ट भवानी की।
अग्नि से अग्नि देवता, पूर्व दिशा में ऐन्द्री।
दक्षिण में वाराही मेरी, नैऋत्य में खड़ग धारणी।
वायु से मां मृगवाहिनी, पश्चिम में देवी वारुणी।
उत्तर में मां कौमारी जी, ईशान में शूलधारी जी।
ब्रह्माणी माता अर्श पर, माँ वैष्णवी इस फर्श पर।
चामुण्डा दस दिशाओं में हर कष्ट तुम मेरा हरो।
संसार में माता मेरी रक्षा करो, रक्षा करो।
सन्मुख मेरे देवी जया, पाछे हो माता विजया।
अजिता खड़ी बायें मेरे, अपराजिता दायें मेरे।
उद्योतिनी मां शिखा की, मां उमा देवी सिर की ही।
माला धारी ललाट की, और भृकुटी की मां यशस्वनी।
भृकुटी के मध्य त्रयनेत्रा, यम घण्टा दोनो नासिका।
काली कापोलों की कर्ण, मूलों की माता शंकरी।
नासिका में अंश अपना मां सुगन्धा तुम धरो।
संसार में माता मेरी रक्षा करो, रक्षा करो।
ऊपर व नीचे होठों की माँ चर्चका अमृतकली।
जीभा की माता सरस्वती, दाँतो की कौमारी सती।
इस कंठ की मां चण्डिका और चित्रघण्टा घण्टी की।
कामाक्षी मां ठोड़ी की, मां मंगला इस वाणी की।
ग्रीवा की भद्रकाली मां, रक्षा करे बलशाली मां।
दोनों भुजाओं की मेरे रक्षा करें धनु धारणी।
दो हाथों के सब अंगो की रक्षा करे जगतारणी।
शूलेश्वरी, कूलेश्वरी, महादेवी, शोक विनाशिनी।
छाती स्तनों और कन्धो की रक्षा करें जगवासिनी।
हृदय उदर और नाभिके कटि भाग के सब अंगो की।
गुहमेश्वरी मां पूतना, जग जननी श्यामा रंग की।
घुटनों जंघाओ की करे रक्षा वोह विन्ध्य वासिनी।
टखनों व पांव की करे रक्षा वो शिव की दासिनी।
दोहा- रक्त मांस और हड्डियों से जो बना शरीर।
आंतो और पित वात में भरा अग्न और नीर।
बल बुद्धि अहंकार और प्राण अपान समान।
सत, रज, तम के गुणों में फंसी है यह जान।
धार अनेकों रुप ही रक्षा करियो आन।
तेरी कृपा से ही मां चमन का है कल्याण।
आयु यश और कीर्ति धन सम्पत्ति परिवार।
ब्रह्माणी और लक्ष्मी पार्वती जगतार।
विद्या दे मां सरस्वती सब सुखों की मूल।
दुष्टों से रक्षा करो हाथ लिये त्रिशूल।
भैरवी मेरी भार्या की रक्षा करो हमेश।
मान राज दरबार में देवें सदा नरेश।
यात्रा में दुःख कोई न मेरे सिर पर आये।
कवच तुम्हारा हर जगह मेरी करे सहाये।
ऐ जग जननी कर दया इतना दो वरदान।
लिखा तुम्हारा कवच यह पढ़े जो निश्चय मान।
मनवांछित फल पाए वह मंगल मोद बसाए।
कवच तुम्हारा पढ़ते ही नवनिधि घर आये।
ब्रह्मा जी बोले सुनो मारकन्डे,
यह दुर्गा कवच मैंने तुमको सुनाया।
रहा आज तक था गुप्त भेद सारा,
जगत की भलाई को मैंने बताया।
सभी शक्तियां जग की करके एकत्रित,
है मिट्टी की देह को इसे जो पहनाया।
चमन जिसने श्रद्धा से इस को पढ़ा जो,
सुना तो भी मुंह मांगा वरदान पाया।
जो संसार में अपने मंगल को चाहे,
तो हरदम यही कवच गाता चला जा।
बियावान जंगल दिशाओं दशो में।
तू शक्ति की जय जय मनाता चला जा।
तू जल में, तू थल में, तूअग्नि पवन में,
कवच पहन कर मुस्कराता चला जा।
निडर हो विचर मन जहां तेरा चाहे,
चमन कदम आगे बढ़ाता चला जा।
तेरा मान धन धाम इससे बढ़ेगा,
तू श्रद्धा से दुर्गा कवच को जो गाये।
यही मन्त्र,यन्त्र यही तन्त्र तेरा,
यही तेरे सिर से है संकट हटाये।
यही भूत और प्रेत के भय का नाशक,
यही कवच श्रद्धा व भक्ति बढ़ाये।
इसे नित्य प्रति चमन श्रद्धा से पढ़ कर।
जो चाहे तो मुंह मांगा वरदान पाये।
दोहा – इस स्तुति के पाठ से पहले कवच पढ़े।
कृपा से आदि भवानी की बल और बुद्धि बढ़े।
श्रद्धा से जपता रहे जगदम्बे का नाम ।
सुखभोगे संसार में अन्त मुक्ति सुखधाम।
कृपा करो मातेश्वरी, बालक चमन नादान ।
तेरे दर पर आ गिरा करो मैय्या कल्याण।
दुर्गा स्तुति – श्री मंगला जयन्ती स्तोत्र
श्री मंगला जयन्ती स्तोत्र
वरमांगू वरदायनी निर्मल बुद्धि दो।
मंगला स्तोत्र पढू सिद्ध कामना हो।
ऋषियों के यह वाक्य हैं सच्चे सहित प्रमाण ,
श्रद्धा भाव से जो पढ़े सुने हो जाये कल्याण।
जय मां मंगला भद्रकाली महारानी,जयन्ती महा चण्डी दुर्गा भवानी।
मधु कैटभ तुम ने थे संहार दीने, मैय्या चण्ड और मुण्ड भी मार दीने।
दया करके मेरे भी संकट मिटाना,मझे रुप जय तेज और यश दिलाना
जभी रक्तबीज ने प्रलय मचाई। डरे देव देने लगे तब दुहाई।
तो माँ मंगला चण्डी बन कर तू आई।पिया खून उसका अलख ही मिटाई।
तू ही शत्रुओं का मिटाती निशा हो। पुकारें जहां पहुंच जाती वहां हो।
दया करके मेरी भी आशा पुजाना।मुझे रुप जय तेज और यश दिलाना।
सभी रोग चिन्ता मिटाती हो अम्बे। सभी मुश्किलों को हटाती हो अम्बे।
तू ही दासों का दाती कल्याण करती। तू ही लक्ष्मी बन के भण्डार भरती।
शिवा और इन्द्राणी परमेश्वरी तू । ‘चमन’ अपने दासों की मातेश्वरी तू।
जगत जननी मेरी भी बिगड़ी बनाना। मुझे रुप जय तेज और यश दिलाना।
जो भक्ति व श्रद्धा से गुण तेरे गाये।जो विश्वास से अम्बे तुझ को ध्याये।
पढे दर्गा स्तुति तेरी महिमा जाने। सुने पाठ मैय्या तेरी शक्ति माने।
उसे पुत्र पौत्र आदि धन धाम देना।गृहस्थी के घर में सुख आराम देना।
चढ़ी सिंह पर अपना दर्शन दिखाना। मुझे रुप जय तेज और यश दिलाना।
यह स्तोत्र पढ़ कर जो सिर को झुकाए। सुने पाठ अम्बे तेरा नाम गाए।
उसे मैय्या चरणों में अपने लगाना। अवश्य उसकी आशाएं सारी पुजाना।
‘चमन’ को तो पूरा है विश्वास दाती। है रग रग में मेरी तेरा वास दाती।
तभी तो कहूं शक्ति अमृत पिलाना। मुझे रुप जय तेज और यश दिलाना।
नोट :- हर मंगलवार को प्रातः श्री दुर्गा स्तुति का पाठ करे सभी नवरात्रों में इस पाठ का विशेष महत्व है।
श्री अर्गला स्तोत्र नमस्कार..
नमस्कार देवी जयन्ती महारानी। श्री मंगला काली दुर्गा भवानी।
कृपालनी और भद्रकाली क्षमा मां। शिवा धात्री श्री स्वाहा रमा मां।
नमस्कार चामुण्डे जग तारिनी को। नमस्कार मधुकैटभ संहारिणी को।
नमस्कार ब्रह्मा को वर देने वाली।ओ भक्तों के संकट को हर लेने वाली।
तू संसार में भक्तों को यश दिलाये। तू दुष्टों के पंजे से सब को बचाये।
तेरे चरण पूजू तेरा नाम गाऊं। तेरे दिव्य दर्शन को हृदय से चाहूं।
मेरे नैनों की मैय्या शक्ति बढ़ा दे। मेरे रोग संकट कृपा कर मिटा दे।
तेरी शक्ति से मैं विजय पाता जाऊं।तेरे नाम के यश को फैलाता जाऊ।
मेरी आन रखना मेरी शान रखना। मेरी मैय्या बेटे का तुम ध्यान रखना।
बनाना मेरे भाग्य दु:ख दूर करना।तू है लक्ष्मी मेरे भण्डार भरना।
न निरआस दर से मुझे तुम लौटाना। सदा वैरियों से मुझे तुम बचाना।
मुझे तो तेरा बल है विश्वास तेरा।तेरे चरणों में है नमस्कार मेरा।
नमस्कार परमेश्वरी इन्द्राणी। नमस्कार जगदम्बे जग की महारानी।
मेरा घर गृहस्थी स्वर्ग सम बनाना।मुझे नेक संतान शक्ति दिलाना।
सदा मेरे परिवार की रक्षा करना। न अपराधों को मेरे दिल माहिं धरना।
नमस्कार और कोटि प्रणाम मेरा।सदा ही मैं जपता रहं नाम तेरा।
जो स्तोत्र को प्रेम से पढ रहा हो। जो हर वक्त स्तुति तेरी कर रहा हो।
उसे क्या कमी है जमाने में माता। भरे सम्पत्ति कुल खजाने में माता।
जिसे तेरी कृपा का अनुभव हुआ है।वही जीव दुनियां में उज्जवल हुआ है।
जगत जननी मैय्या का वरदान पाओ। ‘चमन’ प्रेम से पाठ दुर्गा का गाओ।
दोहा :- सुख सम्पत्ति सब को मिले रहे क्लेश न लेंश।
प्रेम से निश्चय धार कर पढे जो पाठ हमेश।
संस्कृत के श्लोकों में गूढ़ है रस लवलीन। ऋषि वाक्यों के भावों को समझे कैसे दीन।
अति कृपा भगवान की ‘चमन’ जभी हो जाए। पढ़े पाठ मनो कामना पूर्ण सब हो जाए।
कीलक स्तोत्र
कीलक स्तोत्र
मारकडे ऋषि वचन उचारी, सुनने लगे ऋषि बनचारी।
नीलकंठ कैलाश निवासी, त्रयनेत्र शिव सहज उदासी।
कीलक मंत्र में सिद्धि जानी, कलियुग उल्ट भाव अनुमानी।
कील दियो सब यन्त्र मन्त्र तत्रनी शक्ति कीन परतन्त्र।
तेही शंकर स्तोत्र चंडिका का, राखियो गुप्त काहू से न कहा।
फलदायक स्तोत्र भवानी, कीलक मन्त्र पढे नर ज्ञानी।
नित्यपाठ करें प्रेम सहित जो, जग में विचरे कष्ट रहित हो।
ताके मन में भय कही नाही, सिंधू आकाश त्रिलोकी माहि।
जन्म जन्म के पाप यह भस्म करे पल माहि।
दुर्गा पाठ से सुख मिले इस में संशय नाहिं।
जीवत मनवाछित फल पाए , अंतसमय फिर स्वर्ग सिधाए।
देवी पूजन करे जो नारी, रहे सुहागिन सदा सुखारी।
सुतवित सम्पत्ति सगरी पावे, दुर्गा पाठ जो प्रेम से गावे।
शक्ति बल से रहे अरोगा, जो विधि देवे अस संजोगा।
अष्टभुजी दुर्गा जगतारिणी, भक्तों के सब कष्ट निवारनी।
पाठ से गुण पावे गुणहीना, पाठ-से सुख पावे अति दीना,
पाठ से भाग लाभ यश लेही। पाठ से शक्ति सब कुछ देही।
अशुद्ध अवस्था में न पढियो, अपने संग अनर्थ न करियो।
शुद्ध वचन और शुद्ध नीत कर, भगवती के मन्दिर में जा पढ़।
प्रेम से वन्दना करे मात की, हो जाय शुद्ध महा पात की।
नवरात्र घी जोत जला के, विनय सुनाये सीस झुकाके।
जगादाता जग जननी जानी, मन की कामना कहे बखानी।
दुर्गा स्तोत्र प्रेम से पढ़े सहित आनन्द।
भाग्य उदय हो ‘चमन’ के चमके मुख सम चन्द!
विनम्र प्रार्थना..
विनम्र प्रार्थना
मुझ पर दया करो जग जननी, सब अपराध क्षमा कर दो।
शारदा मातां बुद्धि दो, मां लक्ष्मी भण्डारे भर दो।
आवाहन विसर्जन पूजा, कुछ भी करना जानूं न।
कर्म काण्ड भक्ति के मन्त्र क्या हैं यह पहचानूं न।
मैं अपराधों सहित भवानी शरण तुम्हारी आया हूं।
अज्ञानी बालक को बख्शो दाती तेरा जाया है।
प्रगट गुप्त जो औगन हो गये उन पर ध्यान न धरना माँ।
पाठ ‘चमन’ मैं करूं तुम्हारा, आशा पूर्ण करना माँ।
श्री दुर्गा स्तुति चौथा अध्याय
श्री दुर्गा स्तुति पांचवा अध्याय
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